सामाजिक अनुसन्धान एवं सांख्यिकी Samajik Anusandhan Evam Sankhyiki (Social Research and Statistics) by डॉ.रूप राज Dr. Roop Raj

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Dr. Roop Raj is working as Associate Professor, Department of Economics, HNBG Central University, Uttarakhand, India. He has done B.A. Economics (Hons.), M.A. Economics, M.Phil. Economics, UGC-NET-JRF Economics and Ph.D. in Economics. He has contributed extensively in the field of Economics. He has been awarded the Young Researcher Award -2022. He has more than 10 years of teaching experience. He has 6 chapters published in Taylor and Francis Scopus Indexed Conference Proceedings. He has published 58 research papers in reputed peer reviewed journals (Clarivate Analytics Web of Science, Scopus indexed) published by reputed publishers (Such as Springer, Elsevier, Wiley, Hindawi, Emerald, IEEE, Inderscience etc.) and has also authored 6 books. He has attained Google Scholar citations- 405 and h-index-16. He has also participated and presented more than 60 research papers in several national and international Conferences Sponsored by ICSSR, DGHE etc. He is a life member of many organizations/societies.

यह पुस्तक सामाजिक विज्ञानों में अनुसंधान और सांख्यिकीय विश्लेषण के समन्वय को समझाने वाली एक अत्यंत उपयोगी और समग्र कृति है। इसमें सामाजिक अनुसंधान की प्रक्रिया को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हुए यह बताया गया है कि किस प्रकार सांख्यिकी के उपकरणों और तकनीकों के माध्यम से सामाजिक तथ्यों का विश्लेषण अधिक सटीक, विश्वसनीय और वस्तुनिष्ठ बनाया जा सकता है। लेखक ने इस ग्रंथ में यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक सामाजिक अनुसंधान में सांख्यिकी केवल सहायक साधन नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आधार बन चुकी है, जो शोध निष्कर्षों की प्रामाणिकता को सुदृढ़ करती है।

इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें अनुसंधान की मूलभूत अवधारणाओं—जैसे समस्या निर्धारण, परिकल्पना निर्माण, अनुसंधान डिज़ाइन, तथा डेटा संग्रहण—को विस्तार से समझाने के साथ-साथ सांख्यिकीय विधियों का भी व्यवस्थित और सरल प्रस्तुतीकरण किया गया है। इसमें प्राथमिक और द्वितीयक आंकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण, सारणीकरण, तथा प्रस्तुतीकरण की विधियों के साथ-साथ माध्य (Mean), माध्यिका (Median), बहुलक (Mode), प्रसरण (Dispersion), सहसंबंध (Correlation) तथा प्रतिगमन (Regression) जैसी महत्वपूर्ण सांख्यिकीय तकनीकों को स्पष्ट उदाहरणों सहित समझाया गया है। इससे पाठक न केवल सिद्धांत को समझ पाता है, बल्कि उसे व्यवहार में लागू करने की क्षमता भी विकसित करता है।

पुस्तक में यह भी बताया गया है कि सामाजिक अनुसंधान में निष्कर्षों की विश्वसनीयता और वैधता सुनिश्चित करने के लिए सांख्यिकीय विश्लेषण का सही उपयोग कितना आवश्यक है। लेखक ने जटिल गणनाओं और सूत्रों को सरल भाषा और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया है, जिससे यह पुस्तक उन विद्यार्थियों के लिए भी सहज हो जाती है, जिन्हें गणित या सांख्यिकी का पूर्व ज्ञान कम है। इस प्रकार यह ग्रंथ अनुसंधान और सांख्यिकी के बीच एक प्रभावी सेतु का कार्य करता है।

भाषा की दृष्टि से यह पुस्तक अत्यंत सरल, स्पष्ट और विद्यार्थी-हितैषी है, जिससे यह स्नातक, स्नातकोत्तर तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी बन जाती है। इसके अतिरिक्त, शोधार्थियों के लिए यह एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है, जो उन्हें अपने अनुसंधान कार्य को अधिक वैज्ञानिक, सटीक और व्यवस्थित बनाने में सहायता प्रदान करती है।

अंततः, “सामाजिक अनुसन्धान एवं सांख्यिकी” एक ऐसी महत्वपूर्ण कृति है, जो सामाजिक अनुसंधान के सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों पक्षों को समान रूप से सुदृढ़ करती है। यह पुस्तक पाठकों को अनुसंधान की गहराई में जाने, आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने, तथा सार्थक और प्रमाणिक निष्कर्ष प्रस्तुत करने की दिशा में सक्षम बनाती है, जिससे यह सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में एक आधारभूत और अनिवार्य अध्ययन सामग्री के रूप में स्थापित होती है।

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