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"प्रतियोगिता
समाजशास्त्र"
हिन्दी में प्रकाशित एक अत्यंत विशिष्ट और अद्वितीय कृति है, जिसे तीन खंडों —
(क)
समाजशास्त्र परिचय, (ख) पश्चिमी सामाजिक चिन्तन, तथा (ग) बदलता भारतीय समाज — में
विभाजित किया गया है। इस पुस्तक को विख्यात समाजशास्त्री डॉ.
जे. पी. सिंह
द्वारा रचित किया गया है, जिनका शिक्षण और लेखन क्षेत्र में वर्षों का अनुभव इसे
और अधिक प्रामाणिक बनाता है। पुस्तक की विशेषता इसके गहन अध्ययन-सामग्री,
फुटनोट्स, मानचित्र, तालिकाओं और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में निहित है, जो न केवल
छात्रों को गहराई से विषय समझाने में सहायक है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की
दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है। यह पुस्तक इस प्रकार रचित है कि चाहे
विद्यार्थी इंटरमीडिएट स्तर पर हो, बी.ए. कर रहा हो या एम.ए. — सभी के लिए समान
रूप से उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक है। डॉ. सिंह ने समाजशास्त्र की जटिल अवधारणाओं को
अत्यंत सरल, सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया है, जिससे यह पुस्तक न
केवल छात्रों बल्कि शिक्षकों एवं विषय-प्रेमियों के लिए भी अत्यावश्यक बन जाती है।
निःसंदेह, "प्रतियोगिता समाजशास्त्र"
अपने विषय की पहली और सर्वोत्तम कृति के रूप में पाठकों के बीच स्थान बना रही है —
ऐसी पुस्तक जो अब तक के शैक्षणिक बाजार में अनुपस्थित थी और जिसकी आवश्यकता लंबे
समय से महसूस की जा रही थी।
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