यह पुस्तक छत्तीसगढ़ राज्य के जनजातीय समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं पारंपरिक जीवन का एक गहन और समग्र समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करती है। लेखक ने इस ग्रंथ के माध्यम से जनजातीय समुदायों की विशिष्ट पहचान, उनकी जीवन-शैली, परंपराएँ, रीति-रिवाज, और सामाजिक संरचना को अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ उजागर किया है। विशेष रूप से भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जनजातीय समाज की समझ सामाजिक समरसता और समावेशी विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, और यह पुस्तक उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
इस पुस्तक की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें छत्तीसगढ़ की विभिन्न जनजातियों—जैसे गोंड, बैगा, मुरिया, हल्बा आदि—के सामाजिक संगठन, पारिवारिक व्यवस्था, विवाह प्रथाओं, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया गया है। लेखक ने यह भी दर्शाया है कि जनजातीय समाज केवल परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा है, जिसमें आधुनिकता, शिक्षा, औद्योगीकरण और सरकारी नीतियों का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ रहा है।
पुस्तक में जनजातीय समाज के आर्थिक जीवन—जैसे आजीविका के साधन, कृषि पद्धतियाँ, वनों पर निर्भरता तथा पारंपरिक व्यवसाय—का भी गहन अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही, जनजातीय क्षेत्रों में विकास की चुनौतियाँ, विस्थापन, गरीबी, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को भी गंभीरता से उठाया गया है। लेखक ने इन समस्याओं के समाधान के लिए नीतिगत उपायों और विकासात्मक योजनाओं की भूमिका को भी स्पष्ट किया है, जिससे यह पुस्तक केवल वर्णनात्मक न होकर विश्लेषणात्मक और समाधानपरक बन जाती है।
इस ग्रंथ की भाषा सरल, स्पष्ट और छात्रोपयोगी है, जिससे यह समाजशास्त्र के स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। जटिल समाजशास्त्रीय अवधारणाओं को भी स्थानीय संदर्भों और उदाहरणों के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि पाठक विषय की गहराई को आसानी से समझ सके।
अंततः, “छत्तीसगढ़ का जनजातीय समाजशास्त्र” एक महत्वपूर्ण और प्रामाणिक कृति है, जो जनजातीय समाज के बहुआयामी स्वरूप को समझने का सशक्त माध्यम प्रदान करती है। यह पुस्तक न केवल जनजातीय जीवन की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को उजागर करती है, बल्कि आधुनिक परिवर्तन की प्रक्रिया में उनके सामने आने वाली चुनौतियों और संभावनाओं को भी संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जिससे यह समाजशास्त्र के क्षेत्र में एक आधारभूत और मूल्यवान अध्ययन सामग्री के रूप में स्थापित होती है।