भारत में परिवर्तनशील सामाजिक संस्थाएं Bharat mein parivartanshil Samajik Sansthaen (Changing of Social Institutions in India) by डॉ. ध्रुव कुमार दीक्षित Dr. Dhruv Kumar Dixit

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भारत में परिवर्तनशील सामाजिक संस्थाएँ — Dr. Dhruv Kumar Dixit (डॉ. ध्रुव कुमार दीक्षित)

यह पुस्तक भारतीय समाजशास्त्र के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समकालीन कृति के रूप में स्थापित होती है, जिसमें भारतीय सामाजिक संस्थाओं के बदलते स्वरूप का गहन एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने इस ग्रंथ के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि समाज एक स्थिर इकाई नहीं, बल्कि एक निरंतर गतिशील संरचना है, जिसमें समय, परिस्थितियों और बाहरी प्रभावों के अनुसार निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। विशेष रूप से भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और बहुस्तरीय समाज में सामाजिक संस्थाओं—जैसे परिवार, विवाह, जाति, धर्म, शिक्षा तथा आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं—में हो रहे परिवर्तन को समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, और यह पुस्तक उसी दिशा में एक सार्थक प्रयास है।

इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें पारंपरिक भारतीय सामाजिक संरचनाओं के ऐतिहासिक स्वरूप को आधार बनाकर उनके वर्तमान परिवर्तित रूप का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। लेखक ने संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ते रुझान, विवाह संस्थान में बदलते मूल्य, जाति व्यवस्था की बदलती प्रकृति, तथा धर्म और शिक्षा के क्षेत्र में आधुनिकता और वैश्वीकरण के प्रभाव को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि तकनीकी विकास, शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा वैश्विक संपर्क ने भारतीय सामाजिक संस्थाओं को किस प्रकार पुनर्गठित किया है।

पुस्तक में सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न आयामों—जैसे संरचनात्मक परिवर्तन, सांस्कृतिक परिवर्तन, और वैचारिक परिवर्तन—को भी विस्तार से समझाया गया है। लेखक ने यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि सामाजिक संस्थाएँ केवल बाहरी प्रभावों से ही नहीं, बल्कि आंतरिक सामाजिक आंदोलनों, नीतिगत परिवर्तनों और शिक्षा के प्रसार के माध्यम से भी रूपांतरित होती हैं। इस दृष्टि से यह पुस्तक न केवल एक सैद्धांतिक अध्ययन है, बल्कि यह भारतीय समाज की वास्तविकताओं को भी प्रतिबिंबित करती है।

भाषा की दृष्टि से यह पुस्तक अत्यंत सरल, सहज और छात्रोपयोगी है, जिससे यह स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी बन जाती है। जटिल समाजशास्त्रीय अवधारणाओं को भी इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि पाठक उन्हें बिना किसी कठिनाई के समझ सके और अपने अध्ययन में उनका प्रभावी उपयोग कर सके।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि “भारत में परिवर्तनशील सामाजिक संस्थाएँ” भारतीय समाज के गतिशील स्वरूप को समझने के लिए एक आधारभूत और मार्गदर्शक ग्रंथ है, जो पाठकों को न केवल सामाजिक संस्थाओं के पारंपरिक स्वरूप से परिचित कराता है, बल्कि उनके वर्तमान और भविष्य के संभावित स्वरूप की भी एक स्पष्ट झलक प्रदान करता है। यह पुस्तक आपके आगामी ग्रंथ के लिए एक सशक्त संदर्भ और प्रेरणा स्रोत के रूप में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

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