आधुनिक भारत का इतिहास (1757-1857) Aadhunik Bharat ka itihas by डॉ. राजेश कुमार शर्मा Dr. Rajesh Kumar Sharma

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यह पुस्तक भारतीय इतिहास के उस निर्णायक कालखंड का विस्तृत और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है, जिसे आधुनिक भारत के उदय की आधारशिला माना जाता है। 1757 के Battle of Plassey से लेकर 1857 के Revolt of 1857 तक की घटनाओं को केंद्र में रखते हुए लेखक ने इस अवधि के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक परिवर्तनों का गहन विवेचन किया है। यह काल न केवल औपनिवेशिक शासन की स्थापना का साक्षी रहा, बल्कि भारतीय समाज में व्यापक परिवर्तन और नवजागरण की प्रक्रियाओं का भी आरंभ इसी समय हुआ।

इस पुस्तक की प्रमुख विशेषता इसका क्रमबद्ध और समग्र दृष्टिकोण है, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय, विस्तार और प्रशासनिक नीतियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि किस प्रकार व्यापारिक उद्देश्य से भारत आए अंग्रेज धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गए और उन्होंने भारतीय राज्यों को पराजित कर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। साथ ही, कंपनी शासन की नीतियों—जैसे स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्था—का भारतीय कृषि और ग्रामीण जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को भी विस्तार से समझाया गया है।

पुस्तक में सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस काल में हुए सामाजिक सुधार आंदोलनों, शिक्षा के प्रसार, तथा आधुनिक विचारों के आगमन को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने यह भी दर्शाया है कि पश्चिमी शिक्षा, मिशनरी गतिविधियों और प्रिंट संस्कृति के प्रसार ने भारतीय समाज में नई चेतना उत्पन्न की, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखी।

आर्थिक दृष्टि से यह पुस्तक औपनिवेशिक शोषण की प्रकृति, भारतीय उद्योगों के पतन, व्यापारिक नीतियों में बदलाव, तथा धन के निष्कासन (Drain of Wealth) जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं का विश्लेषण करती है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि अंग्रेजी शासन की आर्थिक नीतियों ने भारतीय समाज की संरचना को किस प्रकार प्रभावित किया और किस प्रकार यह असंतोष 1857 के विद्रोह के रूप में सामने आया।

भाषा की दृष्टि से यह पुस्तक सरल, स्पष्ट और विद्यार्थी-हितैषी है, जिससे यह स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, PCS आदि) की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। जटिल ऐतिहासिक घटनाओं को भी सहज और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक विषय को गहराई से समझ सके।

अंततः, “आधुनिक भारत का इतिहास (1757–1857)” एक महत्वपूर्ण और प्रामाणिक कृति है, जो भारतीय इतिहास के इस संक्रमणकाल को समझने के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती है। यह पुस्तक न केवल औपनिवेशिक शासन की स्थापना और उसके प्रभावों को स्पष्ट करती है, बल्कि भारतीय समाज में उभर रही नई चेतना और परिवर्तन की प्रक्रियाओं को भी प्रभावी रूप से प्रस्तुत करती है, जिससे यह इतिहास के अध्ययन के लिए एक अनिवार्य और मूल्यवान ग्रंथ के रूप में स्थापित होती है।

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